EV vs Petrol: नई कार लेने से पहले जान लें 5 साल का असली रनिंग कॉस्ट का गणित

नई कार खरीदने से पहले समझें EV और पेट्रोल कार का 5 साल का असली खर्च, कौन सा विकल्प पड़ेगा जेब पर हल्का

Tata Motors समेत कई कंपनियां आज इलेक्ट्रिक और पेट्रोल दोनों तरह की कारें बेच रही हैं, जिससे खरीदारों के सामने बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि कौन सी कार लंबे समय में सस्ती पड़ेगी। आम तौर पर लोग सिर्फ गाड़ी की ऑन रोड कीमत देखकर फैसला कर लेते हैं, लेकिन असली फर्क रनिंग कॉस्ट और मेंटेनेंस में पड़ता है। पेट्रोल कार सस्ती दिखती है, जबकि EV महंगी लगती है, लेकिन पांच साल के इस्तेमाल में दोनों का कुल खर्च अलग तस्वीर दिखाता है।

अगर रोजाना ड्राइव ज्यादा है और सालाना हजारों किलोमीटर कार चलनी है, तो EV का फायदा साफ नजर आता है। वहीं जिनकी ड्राइव कम है, उनके लिए पेट्रोल कार अभी भी आसान विकल्प मानी जाती है। इसलिए सिर्फ माइलेज या बैटरी रेंज देखकर नहीं, बल्कि पूरे पांच साल के खर्च को देखकर फैसला करना समझदारी है। नीचे दिए गए टेबल में एक औसत हिसाब से दोनों का खर्च समझाया गया है।

EV vs Petrol: 5 साल का रनिंग कॉस्ट तुलना

खर्च का प्रकारइलेक्ट्रिक कार EVपेट्रोल कार
शुरुआती कीमतलगभग ₹14 लाखलगभग ₹10 लाख
सालाना चलना12000 किमी12000 किमी
एनर्जी खर्च प्रति किमीलगभग ₹1.2लगभग ₹6
5 साल का फ्यूल या चार्ज खर्चलगभग ₹72000लगभग ₹3.6 लाख
सर्विस और मेंटेनेंसलगभग ₹25000लगभग ₹80000
कुल 5 साल का खर्चलगभग ₹14.97 लाखलगभग ₹14.4 लाख

खरीद कीमत का फर्क
EV आम तौर पर पेट्रोल कार से महंगी होती है क्योंकि बैटरी की लागत ज्यादा होती है। मान लीजिए पेट्रोल कार ₹10 लाख में मिल रही है, वहीं उसी सेगमेंट की EV करीब ₹14 लाख में आती है। पहली नजर में यही फर्क लोगों को पेट्रोल की तरफ खींचता है। लेकिन यही फर्क धीरे धीरे फ्यूल खर्च में रिकवर होता है।

फ्यूल बनाम चार्जिंग खर्च
पेट्रोल कार अगर औसतन 18 kmpl का माइलेज दे रही है और पेट्रोल ₹100 प्रति लीटर है, तो एक किलोमीटर चलाने का खर्च करीब ₹5.5 से ₹6 बैठता है। वहीं EV अगर घर पर चार्ज की जाए तो एक किलोमीटर का खर्च लगभग ₹1 से ₹1.5 के बीच रहता है। यही वजह है कि ज्यादा चलने वालों के लिए EV धीरे धीरे सस्ती पड़ने लगती है।

मेंटेनेंस का फर्क
पेट्रोल कार में इंजन ऑयल, क्लच, फिल्टर और कई मूविंग पार्ट्स होते हैं, जिनकी सर्विसिंग बार बार करानी पड़ती है। EV में इंजन की जगह मोटर होती है और पार्ट्स कम होते हैं, इसलिए सर्विस खर्च भी कम रहता है। पांच साल में पेट्रोल कार पर जहां करीब ₹80 हजार खर्च हो सकता है, वहीं EV में यह लगभग ₹25 हजार तक सीमित रह सकता है।

बैटरी और रिस्क फैक्टर
EV में सबसे बड़ा सवाल बैटरी का होता है। आम तौर पर कंपनियां 8 साल या 160000 किमी तक की बैटरी वारंटी देती हैं। अगर पांच साल के अंदर बैटरी में दिक्कत आती है तो वारंटी में बदल जाती है। पेट्रोल कार में ऐसा कोई बड़ा एकमुश्त खर्च नहीं होता, लेकिन फ्यूल की कीमत बढ़ने का रिस्क हमेशा बना रहता है।

किसके लिए EV सही है
अगर आपकी रोजाना ड्राइव ज्यादा है, जैसे ऑफिस आना जाना, टैक्सी या डिलीवरी का काम, तो EV आपके लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। शहर में रहने वाले लोग, जिनके पास घर पर चार्जिंग की सुविधा है, उन्हें EV से ज्यादा बचत मिलती है। कम शोर, कम खर्च और आसान ड्राइविंग इसका बड़ा फायदा है।

किसके लिए पेट्रोल कार बेहतर है
अगर आपकी ड्राइव कम है और आप लंबी दूरी कभी कभार ही जाते हैं, तो पेट्रोल कार अभी भी सुविधाजनक विकल्प है। चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की टेंशन नहीं रहती और किसी भी जगह फ्यूल आसानी से मिल जाता है। छोटे कस्बों और गांवों में पेट्रोल कार फिलहाल ज्यादा प्रैक्टिकल है।

निष्कर्ष
EV और पेट्रोल कार के बीच फैसला सिर्फ कीमत देखकर नहीं करना चाहिए। पांच साल के खर्च को देखें तो दोनों लगभग बराबर पड़ती हैं, फर्क बस इतना है कि EV में खर्च धीरे धीरे बचता है, जबकि पेट्रोल में हर साल ज्यादा जाता है। अगर आपकी ड्राइव ज्यादा है और चार्जिंग की सुविधा है, तो EV भविष्य का बेहतर विकल्प बन सकती है। वहीं कम चलाने वालों के लिए पेट्रोल कार अभी भी आसान और भरोसेमंद है।

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